सुहागिनों ने की वट वृक्ष की पूजा- अर्चना, सावित्री-सत्यवान की अमर गाथा का है प्रतीक

संभल। हिंदू जागृति महिला मंच के तत्वावधान में वट सावित्री की पूजा धूमधाम से की गई,

नगर में स्थित अमृतकूप मंदिर में वट सावित्री की पूजा अर्चना सभी सुहागिन महिलाओं ने समूह में की। सभी सुहागिन महिलाओं ने व मट वृक्ष की पूजा की रोली, चावल, फूल, मिष्ठान, धूप, दीप आदि चढ़ाकर की सभी महिलाओं ने हाथ में चावल ,फूल लेकर बट सावित्री की कथा पढ़ी।

विवाहित महिलाओं के बीच अत्यधिक प्रचलित जेष्ठ कृष्ण अमावस्या के दिन आने वाले बट सावित्री की कथा निम्न प्रकार से है: भद्र देश के राजा थे ,जिनका नाम अश्वपति था।उनके कोई संतान न थी। उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियां दी।

18 वर्षों तक यह क्रम जारी रहा। इसके बाद सावित्री देवी ने प्रकट होकर वर दिया कि राजन तुझे एक तेजस्वी कन्या पैदा होगी ।सावित्री देवी की कृपा से जन्म लेने के कारण से कन्या का नाम सावित्री रखा गया। कन्या बड़ी होकर बेहद रूपवान हुई। योग्य वर ना मिलने की वजह से सावित्री के पिता दुखी थे ।उन्होंने कन्या को स्वयंवर तलाशने भेजा। सावित्री तपोवन में भटकने लगी । वहां सॉल्व देश के राजा द्रुमत्सेन रहते थे ,क्योंकि उनका राज्य किसी ने छीन लिया था। उनके पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री ने पति के रूप में उनका वरण किया ।

ऋषि राज नारद जी को जब यह बात पता चली तो वह राजा अश्वपति के पास पहुंचे और कहा कि हे राजन !यह कल क्या कर रहे हैं आप? सत्यवान गुणवान है ,धर्मात्मा है और बलवान भी है पर उसकी आयु बहुत छोटी है, वह अल्पायु है। 1 वर्ष के बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी।

ऋषिराज नारद की बात सुनकर राजा अश्वपति घोर चिंता में डूब गए ।सावित्री ने उनसे कारण पूछा, तो राजा ने कहा ,पुत्री तुमने जिस राजकुमार को अपने वर के रूप में चुना है वह अल्पायु है। तुम्हें किसी और को अपना जीवनसाथी बनाना चाहिए। इस पर सावित्री ने कहा कि पिताजी आर्य कन्याएं अपने पति का एक बार ही वरन करती हैं ।राजा एक बारी आज्ञा देता है और पंडित एक बार ही प्रतिज्ञा करते हैं और कन्यादान भी एक बार ही किया जाता है ।

सावित्री हठ करने लगी और बोली में सत्यवान से विवाह करूंगी ।राजा अश्वपति ने सावित्री का विवाह सत्यवान से कर दिया। सावित्री अपने ससुराल पहुंचते ही सास ससुर की सेवा करने लगी ।समय बीतता चला गया नारद मुनि ने सावित्री को पहले ही सत्यवान की मृत्यु के दिन के बारे में बता दिया था ।वह दिन जैसे-जैसे करीब आने लगा, सावित्री अधीर होने लगी। उन्होंने 3 दिन पहले से ही उपवास शुरू कर दिया। नारद मुनि द्वारा कथित निश्चित तिथि पर पितरों का पूजन किया ।

हर दिन की तरह सत्यवान उस दिन भी लकड़ी काटने जंगल चले गए साथ में सावित्री भी गई। जंगल में पहुंचकर सत्यवान लकड़ी काटने के लिए एक पेड़ पर चढ़ गए। तभी उनके सिर में तेज दर्द होने लगा ,दर्द से व्याकुल सत्यवान पेड़ से नीचे उतर पड़े। सावित्री अपना भविष्य समझ गई। सत्यवान के सिर को गोद में रखकर सावित्री सत्यवान का सिर सहलाने लगी ।तभी वहां यमराज आते दिखे। यमराज अपने साथ सत्यवान को ले जाने लगे। सावित्री भी उनके पीछे पीछे चल पड़ी।

यमराज ने सावित्री को समझाने की कोशिश की कि यही विधि का विधान है लेकिन सावित्री नहीं मानी। सावित्री की निष्ठा और पति वरायण को देखकर यमराज ने सावित्री से कहा कि हे देवी तुम धन्य हो तुम मुझसे कोई भी वर मांग लो।

1) सावित्री ने कहा मेरे सास-ससुर वनवासी और अंधे हैं ,उन्हेंआप दिव्य ज्योति प्रदान करें ।यमराज ने कहा ऐसा ही होगा। जाओ घर लौट जाओ लेकिन सावित्री अपने पति सत्यवान के पीछे पीछे चलती रही। यमराज ने कहा देवी तुम वापस जाओ। सावित्री नेकहा भगवन मुझे अपने पतिदेव के पीछे पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं है ।पति के पीछे चलना मेरा कर्तव्य है। यह सुनकर उन्होंने फिर से उसे एक और मांगने के लिए कहा। 2)सावित्री बोलीं हमारे सास ससुर का राज्य छीन गया है उसे पुनः वापिस दिला दें।

2) यमराज ने सावित्री को यह वर भी दे दिया और कहा कि अब तुम लौट जाओ लेकिन सावित्री पीछे पीछे चलती रही ।
यमराज ने सावित्री को तीसरा वरदान मांगने के लिए कहा।

3) इस पर सावित्री ने 100 संतान और सौभाग्य का वरदान मांगा। यमराज ने इस वरदान को भी सावित्री को दे दिया। सावित्री ने यमराज से कहा कि प्रभु में एक पतिव्रता पत्नी हूं और आपने मुझे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया है। यह सुनकर यमराज को सत्यवान के प्राण छोड़ने पड़े। यमराज अंतर्धान हो गए और सावित्री उसी वट वृक्ष के पास आ गई जहां उसके पति का मृत शरीर पड़ा था ।

सत्यवान से जीवंत हो गया और दोनों खुशी-खुशी अपने राज्य की ओर चल पड़े। दोनों जब घर पहुंचे तो देखा माता-पिता को दिव्य ज्योति प्राप्त हो गई है। इस प्रकार सावित्री -सत्यवान चिरकाल तक राज्य सुख भोगते रहे।अतःपति व्रता सावित्री के अनुरूप ही, प्रथम अपने सास-ससुर का उचित पूजन करने के लिए साथ ही अन्य विधियों को प्रारंभ करें ।वट सावित्री व्रत करने और इस कथा को सुनने से उपासक के वैवाहिक जीवन या जीवन साथी की आयु पर किसी प्रकार का कोई संकट आया भी हो तो वह टल जाता है ।बोलो बट सावित्री की जय! बट सावित्री की कथा समाप्त होती है, जय हो श्री गणेश भगवान की जय हो माता पार्वती की। उपस्थित महिलाओं में सरिता गुप्ता, प्रिया गुप्ता ,सुनैना, दीपाशर्मा, प्रिया अग्रवाल ,नीलम वाष्णेय, शशि गुप्ता, कुमुद , पारुल, सुनीता गुप्ता, प्राची, मोहिनी आदि उपस्थित रहीं।