पुण्य-तिथि: यह गाथा है प्रभुभक्त तुलसीराम प्रभु की

महाराष्ट्र के बीड़ जिले में ‘श्रीक्षेत्र परली वैद्यनाथ’ स्थित है। एक समय यहाँ के रावल मठ के अधिकारी श्रीगुरु धर्मनाथ जी महाराज थे। उनके एक शिष्य आत्माराम को कोई सन्तान नहीं थी। एक बार आत्माराम एवं उनकी पत्नी मंजुला देवी ने बहुत व्याकुल होकर महाराज जी से कहा कि आप कुछ ऐसी प्रार्थना करें, जिससे हमारे घर में सन्तान हो जाये। यदि पहली सन्तान पुत्र होगा, तो हम उसे मठ की सेवा में अर्पण कर देंगे।

प्रभु की कृपा से कुछ समय बाद मंजुला देवी को गर्भ ठहर गया और ठीक समय पर उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई। उसका नाम तुलसीराम रखा गया। उन्होंने अपने संकल्प के अनुसार कुछ समय तक पुत्र का पालन किया और फिर उसे मठ में जाकर महाराज जी को समर्पित कर दिया। उसके बाद इस दम्पति को फिर कोई सन्तान नहीं हुई। वे फिर महाराज जी के पास आये कि अब हम इस अवस्था में पहुँच गये हैं कि सन्तान हो ही नहीं सकती। अतः कृपया तुलसीराम को हमें वापस कर दें।

महाराज जी ने जैसी तुम्हारी इच्छा कह कर तुलसीराम को घर जाने की आज्ञा दे दी। कुछ दिन तो ठीक रहा; पर जैसे ही तुलसीराम के विवाह की बात चली, वह पागल जैसा व्यवहार करने लगे। यह देखकर माता-पिता को वैराग्य हो गया और तुलसीराम उसी विक्षिप्त स्थिति में परली वैद्यनाथ आ गये। वहाँ कभी वे ठीक रहते, तो कभी फिर पुरानी अवस्था में आ जाते।

इसके बाद तुलसीराम प्रभु वन, पर्वत, तीर्थ, शमशान, मन्दिरों आदि में भ्रमण करने लगे। लोग उन्हें पागल समझ कर छेड़ते, कुछ पत्थर मारते, कुछ काँटों में ढकेलते; पर वे अपनी धुन में मस्त रहते। कभी-कभी वे 15 मिनट तक पानी में डूबे रहते। यदि कोई सर्प मिलता, तो उससे खेलते रहते।

एक बार किसी को साँप ने काट लिया। वह चिल्लाते हुए मठ में आकर महाराज के चरणों में गिर गया। थोड़ी देर बाद लोगों ने देखा कि वह ऐसे उठकर खड़ा हो गया, मानो नींद से उठा हो। एक बार भक्तों के साथ बैठे वे भजन गा रहे थे। अचानक वे चीखे कि गाँव में कहीं आग लग गयी है। लोग भागकर गये, तो उनकी वाणी सत्य ही थी। इन चमत्कारों के बाद सब समझ गये कि पागल जैसा दिखने वाला यह व्यक्ति साक्षात परमात्मा स्वरूप है।

एक बार नागपंचमी पर तुलसीराम प्रभु झूला झूल रहे थे। अचानक उनका हाथ छूट गया और वे धरती पर आ गिरे; पर महाप्रभु प्रसन्नता से उठ खड़े हुए। इससे उनके हाथ चोटग्रस्त होकर मुड़ गये, जो अन्त तक ऐसे ही रहे। एक बार उन्हें दो दिन तक भीषण ज्वर रहा। उसमें वे अण्ट सण्ट बोलने लगे। लोग उन्हें रावल मठ में ले आये। यहाँ आकर वे फिर पूर्ववत हो गये।

तुलसीराम प्रभु राजा-रंक, पापी-पुण्यात्मा सबको एक दृष्टि से ही देखते थे। अब उनमें एक परिवर्तन और आया। वे कभी-कभी किसी भक्त को पीटने लगते; परन्तु लोगों के मन में उनके प्रति इतनी श्रद्धा थी कि वे इसे भी उनका प्रसाद मानते थे। कभी वे बिल्कुल चुप हो जाते और कई दिन तक नहीं बोलते।

धीरे-धीरे महाप्रभु की स्थिति ऐसी हो गयी कि उन्हें अपने तन, वस्त्र, स्नान, खानपान आदि की सुध भी नहीं रह गयी। भक्तजन ही यह सब करते थे। इसी प्रकार प्रभुभक्ति में लीन रहते हुए तुलसीराम प्रभु ने 27 मई, 1948 को अपनी देह त्याग दी।