Wednesday, July 24, 2024
उत्तर प्रदेश

योगी सरकार ने 5 वर्ष से कोर्ट में दाखिल नहीं किया काउन्टर एफिडेविट,17 अतिपिछड़ी जातियाँ हो रहीं अन्याय की शिकार

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की 17 अति पिछड़ी जातियों को एससी कैटेगरी में शामिल करने को चुनौती देने वाली याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में 20 मई को अहम सुनवाई हुई।हाईकोर्ट ने एक बार फिर से ओबीसी की 17 जातियों को एससी सर्टिफिकेट जारी करने पर रोक बढ़ा दी है। हाईकोर्ट में राज्य सरकार की ओर से सुनवाई की इस तारीख पर भी काउंटर एफिडेविट नहीं दाखिल किया गया। जबकि हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को 13 अप्रैल की पिछली सुनवाई पर काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का अंतिम मौका दिया था।वहीं, मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को जानकारी दी गई कि इस मामले में मंत्रिमंडल की बैठक में पुनर्विचार करेंगे।राष्ट्रीय निषाद संघ के राष्ट्रीय सचिव चौ.लौटनराम निषाद ने कहा कि राज्य सरकार 5 वर्षों से हीलाहवाली करती आ रही है।कहा कि योगी आदित्यनाथ निषाद जातियों के आरक्षण के बड़े पैरोकार रहे हैं और संसद में भी कई बार मुद्दा उठा चुके हैं। 3 जुलाई को गोरखपुर में आयोजित निषाद मछुआरा सम्मेलन को बतौर मुख्य अतिथि सम्बोधित करते हुए कहा था कि अब भाजपा निषाद समाज के आरक्षण व अधिकार की लड़ाई लड़ेगी।उन्होंने निषादों को आरक्षण न मिलने पर सपा को दोषी ठहराते रहे हैं।अब तो भाजपा की डबल इंजन की सरकार है,तो निषाद जातियों व अतिपिछड़ी जातियों को आरक्षण मिलने में देरी क्यों हो रही है?निषाद आरक्षण के सवाल पर निषादों को इकठ्ठा कर राजनीतिक व आर्थिक लाभ उठाने वाले संजय निषाद की जुबान पर भी ताला लग गया है।

गौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 24 जनवरी 2017 को 17 ओबीसी जातियों को सर्टिफिकेट जारी करने पर रोक लगाई थी। इस मामले में राज्य सरकार की ओर से पांच साल बाद भी काउंटर एफिडेविट दाखिल नहीं किया गया। 29 मार्च 2018 को मुख्य न्यायाधीश की खण्डपीठ ने स्टे वैकेट करते हुए जाति प्रमाण पत्र बनाने का अंतरिम निर्णय दिया था।लेकिन योगी के नेतृत्व वाली सरकार ने न्यायालय के निर्णय का अनुपालन न कर नए सिरे से शासनादेश जारी कर मामले को उलझा दिया।
निषाद ने बताया कि योगी सरकार द्वारा जारी शासनादेश को भाजपा कार्यकर्ता गोरख राम ने चुनौती दिया, जिस पर न्यायालय ने स्थगनादेश दे दिया। इससे पूर्व ओबीसी की 17 जातियों को एससी में शामिल करने का नोटिफिकेशन 22 दिसंबर 2016 को तत्कालीन अखिलेश सरकार में जारी हुआ था।इसके बाद 24 जून 2019 को भी योगी सरकार में नोटिफिकेशन जारी हुआ था।इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस नोटिफिकेशन पर भी रोक लगाई हुई है।इससे पहले 2005 में मुलायम सिंह सरकार ने भी नोटिफिकेशन जारी किया था। हालांकि बाद में यह नोटिफिकेशन मायावती सरकार द्वारा 2007 में वापस ले लिया गया था।

निषाद ने बताया कि अखिलेश यादव की सरकार ने कहार, कश्यप, केवट, मल्लाह, निषाद, कुम्हार, प्रजापति, धीवर,बिंद,भर,राजभर, धीमर, बाथम, तुरहा, गोडिया, मांझी और मछुआ जातियों को एससी में शामिल करने का अनुच्छेद-341 का उल्लंघन कर नोटिफिकेशन जारी नहीं किया था बल्कि 10 अगस्त 1950 को राष्ट्रपति द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार अनुसूचित जाति में शामिल मझवार,तुरैहा,बेलदार,गोंड़,शिल्पकार व पासी तड़माली को परिभाषित किया था।
निषाद ने बताया कि इस मामले में जुलाई के पहले हफ्ते में अगली सुनवाई होगी। चीफ जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस जे जे मुनीर की डिवीजन बेंच में मामले की सुनवाई हुई है।20 मई को भी उत्तर प्रदेश सरकार ने न्यायालय के 13 अप्रैल की सुनवाई के दौरान अगली सुनवाई के दिन काउन्टर एफिडेविट दाखिल करने का सख्त निर्देश दिया था।पर सरकार ने इस बार भी दाखिल नहीं किया।

निषाद ने उत्तर प्रदेश सरकार से उच्च न्यायालय में काउन्टर एफिडेविट दाखिल करने के साथ केंद्र सरकार को विधिसम्मत प्रस्ताव भेजकर अनुमोदन करा संविधान संशोधन कराने की मांग किया है।उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध व संविधान से परे जाते हुए सामान्य वर्ग की जातियों को 10 प्रतिशत का ईडब्ल्यूएस आरक्षण कोटा दे दिया गया तो निषाद, मल्लाह,केवट,बिन्द, धीवर,कुम्हार,प्रजापति आदि को देने में देरी क्यों की जा रही है?जबकि भाजपा पहले इन्हें अनुसूचित जाति का आरक्षण दिलाने का वादा व वकालत कर चुकी है।आज तो राज्य व केन्द्र दोनों जगह भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार है,उसके राष्ट्रपति व अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष हैं,तो देरी व हीलाहवाली क्यों?भाजपा की नीयत सही हो तो उसकी चुटकी का खेल है।उन्होंने केन्द्र सरकार को मझवार(माँझी, मल्लाह,केवट),तुरैहा(धीवर,धीमर, तुरहा),गोंड़(गोड़िया,धुरिया,कहार,रैकवार,बाथम),बेलदार(बिन्द),पासी तड़माली(भर,राजभर) व शिल्पकार(कुम्हार) को परिभाषित करते हुए प्रस्ताव भेजकर स्वीकृति दिलाने की मांग की है।कहा कि विधानसभा चुनाव को देखते हुए योगी सरकार ने मझवार की पर्यायवाची जातियों की जानकारी के लिए आरजीआई को पत्र भेजा था,जिसके सन्दर्भ में अभी कोई अग्रेतर जानकारी नहीं दी गयी।